प्राइवेट स्कूलों को फ़ीस देने कि जरूरत नहीं क्योंकि ये लालची और शिक्षा के नाम पड़ शिक्षा का सत्यानाश कर रहें हैं / इस देश में और शिक्षा का खासकर दिल्ली में सत्यानाश जितना इन प्राइवेट स्कूलों ने किया है उतना तो इन स्कूलों को बंद कर दिया जाय तो भी नहीं होगा / अब तो इनको ठीक करना है तो सभी अभिभावक आज से एकजुट होकर इनको फ़ीस देना बंद कर दें / उसके बदले अगर ये आपके बच्चे को परेशान करने या स्कूल से निकालने कि धमकी देते हैं तो डरें नहीं बल्कि इनको अपनी फ़ीस को एक शिक्षण संस्थान के चरित्र के आधार पर तय करने और नहीं करने पड़ कानूनी कार्यवाही करने से पहले दिया जाने वाला नोटिस हर अभिभावक स्कूल को दे और उसमे स्कूल द्वारा अभिभावकों को तरह-तरह से लूटने जैसे फ़ीस नहीं देने या पीछे पे कमिशन के नाम पड़ हर बच्चों से २००० से लेकर ८००० तक उसूला गया और इसके लिए किसी का अडमित कार्ड नहीं देने कि धमकी दी गयी तो किसी को परीक्षा का रिजल्ट नहीं दिया गया ये सारी प्रतारणा कि बातें जरूर लिखें और एकजुट होकर ऐसे स्कूल कि खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए लोगों को एकजुट करें,ऐसा करने पड़ ही दिल्ली में शिक्षा वयवस्था सुधरेगी / खैर थक हार कर लोगों ने इनके धमकी के आगे घुटने टेक दिए ,ये स्कूल नहीं बल्कि शिक्षा के नाम पर लोगों का खून चूसने वाले भेडिये है / ऐसे स्कूल में बच्चों को पढ़ाने से अच्छा तो अनपढ़ रखना होगा क्योंकि ऐसे स्कूल में पढ़कर तो बच्चा कम से कम इन्सान और इंसानियत के उसूलों को तो भूल ही जाएगा लेकिन अनपढ़ रहकर कम से कम इंसानियत को तो नहीं भूलेगा / हमारे देश के राष्ट्रपति महोदया और प्रधान मंत्री महोदय कृपया ध्यान दें, इस ओर / सिर्फ शिक्षा का कानून लाने से नहीं होगा बल्कि शिक्षा में और शिक्षा के व्यवसाय में इन्सान और इंसानियत को भी लाना होगा / आज देश को पढ़ा लिखा वयक्ति से ज्यादा इन्सान और इंसानियत कि जरूरत है ? जरा सोचिये क्या यही इंसानियत है कि ॐ और सदाचार को अपना आधार कहने वाला नरेला का एक स्कूल चौथी क्लास के बच्चे से हर माह १२३५ रुपया टिउशन फ़ीस ,१५० रुपया डेवेलोपमेंट फंड ,७५ रुपया पुपिल्स फंड ,४५० रुपया छह किलोमीटर के लिए यातायात शुल्क और १९०० रुपया ह़र साल सालाना शुल्क उसूलती है , क्या ऐसे शुल्क उसूलने वालों को स्कूल चलाने कि इजाजत सरकार को देनी चाहिए ? ऊपर दिए गए फ़ीस का विवरण चौथी कक्षा के चार दिन पहले जारी किये गए फ़ीस बुक के प्रमाणिक आधार पर आधारित है / आज से फ़ीस देना बंद और पैसों के लालची भेडियों के खिलाफ जंग शुरू , क्या आप हैं इस जंग के लिए तैयार ? अगर हाँ तो हमसे सलाह मशवरे के लिए कभी भी फोन करें -09810752301 हमें लगता है कि देश के महामहिम राष्ट्रपति महोदया को इस बेहद गंभीर मुद्दे पड़ हस्तक्षेप कर दोषी स्कूलों के खिलाफ जरूर कार्यवाही करना चाहिए / आप भी अगर ऐसा ही सोचतें हैं तो इस ब्लॉग पड़ देश के राष्ट्रपति को संबोधित करते हुए अपनी पीड़ा और उसके समाधान महामहिम को बताएं या राष्ट्रपति भवन ,न्यू दिल्ली -११०००४ के पते पड़ पत्र लिखें और दिल्ली में शिक्षा कि दुर्दशा के बारे में बताएं / आप महामहिम को अपने बच्चों को शिक्षा दिलाने में इन लालची स्कूलों द्वारा फ़ीस के नाम पड़ लूटने कि पीड़ा को presidentofindia@rb.nic.in पड़ इ मेल भी कर सकते हैं / देश के महामहिम तक इस गंभीर मुद्दे को पहुँचाना हमारा नागरिक कर्तव्य है / देश के राष्ट्रपति अगर चाहें तो एक दिन में इन स्कूलों को बंद किया जा सकता है और दिल्ली सरकार जो इन लालची स्कूलों के फायदे के लिए सरकारी स्कूलों को बदहाल करके रखती है और कडोरो रुपया शिक्षा मंत्रालय और शिक्षा निदेशालय पड़ खर्च करती है का भी हिसाब दिल्ली सरकार को देना होगा /
Monday, April 12, 2010
Tuesday, April 6, 2010
भारत में लोकतंत्र नही बल्कि खुलेआम मंत्रितंत्र है --------------
भारत में लोकतंत्र को किस पार्टी ने खुलेआम मंत्रितंत्र में बदल कर रख दिया है यह तो मैं ठीक-ठीक नहीं बता सकता लेकिन हम क्या आज पूरा देश यह महसूस कर रहा है क़ी भारत मैं लोकतंत्र नहीं बल्कि मंत्रितंत्र है /कहते है दिल्ली भारत का दिल है और जिस लोकतंत्र का दिल सड़ गया हो वहाँ लोकतंत्र क़ी उम्मीद करना सबसे बड़ी मुर्खता कही जाएगी /अगर हमारी बातों पर किसी को यकीन ना आये तो हमारी बातों पर गौर करने के साथ-साथ जरा संजीदगी से सोचिये -दिल्ली में कोई भी काम लोकतंत्र क़ी मर्यादा के दायरे में नहीं हो रहा है /उदाहरण कई है जैसे -शिक्षा मंत्री का काम होता है ,शिक्षा व्यवस्था को सही कर उसके व्यवसायीकरन को रोकना लेकिन पिछले तीन वर्षों में दिल्ली में देश और प्रदेश दोनों के शिक्षा मंत्री के होते हुए भी दिल्ली में जितना शिक्षा का व्यवसायीकरन कर उसके स्तर को गिराया गया है उतना तो कभी किसी इन्सान ने सपने में भी नहीं सोचा था /इसके कारण पर जब आप गौर करेंगे ,जिसकी चर्चा हर घर में होती है और लोग कहते हैं क़ी जब शिक्षामंत्री निजी स्कूलों से मिलकर अपना और अपने पार्टी के फंड को अरबों तक पहुँचाने का काम करेंगे तो शिक्षा और शिक्षा का असल मकसद ''बच्चों को संस्कार और चरित्र निर्माण क़ी ओर आगे बढाकर देश और समाज को मजबूत आधार प्रदान करना ''दोनों का सत्यानाश होना निश्चित है /शिक्षा व्यवस्था को सही मायने में हमारे देश क़ी सरकार सुधारना ही नहीं चाहती है क्योंकि लोग शिक्षित और विद्वान होंगे तो भ्रष्टाचार और सरकारी पैसे को भ्रष्ट मंत्रियों द्वारा अपने जागीर क़ी तरह इस्तेमाल करने के खिलाफ आवाज उठायेंगे जिससे देश में सुशासन आएगा जो भ्रष्ट और निकम्मे मंत्रियों का सेहत ख़राब कर सकता है और इस देश में,देश और समाज क़ी सेहत बेशक ख़राब हो जाय लेकिन भ्रष्ट मंत्रियों के सेहत क़ी पूरी गारंटी के लिए इस देश का खजाना और आम लोगों क़ी जेब दोनों पूरी तरह खुली है /शर्म आती है ऐसे मंत्रियों पड़ और ऐसी व्यवस्था पड़ /ऐसे मंत्रियों को रखने से अच्छा तो किसी विभाग का कोई मंत्री ना हो तो अच्छा होगा / इसी भारत के दिल दिल्ली में किसी भी सरकारी विभाग का कामकाज दिल्ली के लोगों के सेहत को ठीक करने वाला नहीं बल्कि लोगों को मानसिक यातना देने वाला है /दिल्ली के बिभिन्न ट्रांसपोर्ट ऑथरिटी में स्टाफ क़ी कमी के कारण लोगों को लाएसेंस बनाने और उसे पाने में हजारों रूपये शुल्क देने के बाबजूद महीनों चक्कर काटना पड़ता है /इसी दिल्ली में अगर समाज सेवकों के समूह द्वारा हर सरकारी विभाग के कर्मचारियों के संख्या क़ी जाँच क़ी जाय तो हर विभाग में फर्जी कर्मचारियों क़ी संख्या पायी जाएगी जिन फर्जी नामों पर हर महीने में लाखों का भुगतान होता है जो भ्रष्ट मंत्रियों और अधिकारियों में बंदरबाँट किया जाता है और आम जनता जो सरकारी खजाने को एक माचिस के खरीदने से लेकर विभिन्न प्रकार के टेक्स देकर हर रोज भरती है,उसे सेवा और सुविधा के नाम पड़ हर जगह ठगा और परेशान किया जाता है /वहीँ दूसरी ओर उसी पैसे से भ्रष्टमंत्री और अधिकारी जनता का शोषण और अपना और अपने रिश्तेदारों का खूब सेवा करते हैं /यही है हमारा लोकतंत्र ,अब इसे लोकतंत्र कहें या मंत्रितंत्र ? हमारे नजर में ऐसी स्थिति किसी भी लोकतंत्र के लिए बेहद शर्मनाक है और ऐसी स्थिति का एक ही इलाज है क़ी जनता द्वारा हर सरकारी विभाग का हर दो महीने में सामाजिक जाँच जरूरी कर दिया जाय और जनता को किसी भी भ्रष्टमंत्री के ऊपर कभी भी भ्रष्टाचार का शक होने पर देश के इमानदार समाजसेवकों द्वारा जाँच कराने का अधिकार दिया जाय / ये कैसा लोकतंत्र है जहाँ आमआदमी आज अंग्रेजों क़ी जगह भ्रष्टमंत्रियों और अधिकारियों क़ी गुलामी का दंश झेल-झेल कर भूखे मरने को मजबूर है / आम जनता जो अप्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रपति तक को चुनती है,उसी जनता के विचारों और सुझावों को मंत्रिमंडल के किसी भी निर्णय में शामिल करना और आमलोगों पड़ उस निर्णय से पड़ने वाले दुष्प्रभाव से समाज में उत्पन्न होने वाली असंतुलन से देश को होने वाला भयंकर नुकसान के बारे में कोई भी शोध नहीं किया जाता है ,और ऐसा इसलिए होता है क़ी मंत्रिमंडल में बैठे लोगों के स्वार्थ सिद्धि का शोध और लोगों को कैसे अपने दो वक्त के रोटी के बारे में दिन-रात सोचते रहने और देश व समाज के बारे में नहीं सोचने का शोध किसी भी निर्णय से पहले जरूर कर लिया जाता है / हमारे ख्याल से तो आज के हालात से अच्छा तो इस देश में कोई भी मंत्री और मंत्रालय नहीं होता और जनता खुद खुले आसमान के नीचे एक इमानदार प्रतिनिधि को चुनकर उसे कोई कार्य करने को देती और उससे हर महीने खुले आसमान के नीचे भरी सभा में सवाल-जबाब करती / सही मायने में लोकतंत्र तब होता /इसलिए अगर इस मंत्रीतंत्र को बदलना है तो सारे मंत्री को हटाकर सभी मंत्रालय को बंद कर दिया जाना चाहिए ,क्योंकि इन पड़ होने वाला खर्चा जनता के पैसों क़ी खुलेआम बर्बादी है /
Tuesday, March 23, 2010
कॉमनवेल्थ गेम या भ्रष्टाचार का गेम-------?
जिस तरह से कॉमनवेल्थ गेम को हर सरकारी विभाग में चाहे वह ४९ लाख से ५९ लाख तक के डी टी सी लो फ्लोर ऐ सी और नॉन ऐ सी बसों के खरीद क़ी,चाहे वह दिल्ली के पी डब्लू डी के फर्जी और घटिया प्रोजेक्ट क़ी ,डी टी सी का किराया बढाकर आम लोगों को डी टी सी के भ्रष्टाचार क़ी मार सहने के लिए मजबूर करने क़ी ,मेट्रो रेल के फायदे में चलने के बाबजूद उसका किराया बढाकर जनता को सरकार द्वारा सेवा मुहैया के बदले धोखा क़ी और अब दिल्ली का अव्यावहारिक बजट जो जनता क़ी खुले आम जेब तलाशी है को भी कॉमनवेल्थ गेम को आधार बनाना /
इन सब बातों पड़ विचार करने के बाद यह कहा जा सकता है क़ी यह कॉमनवेल्थ गेम नहीं बल्कि भ्रष्टाचार का गेम है क्या ? ऐसे गेम का क्या फायदा जिसके वजह से आम लोगों को जिन्दा रहने के लिए पल पल मरने या अनैतिकता का सहारा लेना परे /गेम के अंग्रेजी शब्द का क्या अर्थ है,यह तो मुझे नहीं पता लेकिन इसके हिंदी शब्द खेल का अर्थ जो मैंने अपने शिक्षा काल में अपने श्रेष्ट गुरुजनों से सिखा था वह है -खेल,यानि मानवता को श्रेष्ट चरित्र के ओर ले जाकर समाज को चरित्रवान बनाना और सही राह पर चलते हुए अगर कोई हमसे खेल में जीत जाय तो अपनी हार स्वीकार करने के साथ- साथ जीतने वाले को सम्मान क़ी नजर से इसलिए देखना क़ी वह मुझसे सही मायने में आगे है / लेकिन आज खेल से इसका नाम गेम ज्यादा पोपुलर है और इसका कारण शायद इस बात को कहा जा सकता है क़ी खेल का आयोजन भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों को फायदा पहुँचाने का एक मुख्य जरिया बनने के साथ -साथ आम लोगों को तबाह और बर्बाद करने का बहाना बन गया है /जरा सोचिये यह कॉमनवेल्थ गेम प्रोजेक्ट ७६७ करोड़ से १६७० करोड़ का कैसे हो गया ? इसकी जाँच सर्वोच्च न्यायालय के इमानदार जजों और देश के इमानदार समाजसेवको जैसे अन्ना हजारे ,किरण बेदी ,अरविन्द केजरीवाल इत्यादि के एक संयुक्त जाँच समिति द्वारा जरूर होनी चाहिए / भविष्य में ऐसे खेलों के आयोजन से पहले आम लोगों के हितों से सम्बंधित कारणों पर शोध कर उसे आम लोगों के विचारों और सुझावों से संतुलित किया जाना चाहिए ,जिससे आम लोगों को गेम का आयोजन सही मायने में गौरवान्वित करने का काम करे ना क़ी एक आफत क़ी तरह लगे / हम चाहते हैं क़ी इस गेम के बाद इससे जुड़े हर प्रोजेक्ट क़ी बारीकी से जाँच हो जिससे उन भ्रष्ट नेताओं ,इंजीनयरों और आधिकारियों के उस गेम का पता लगाया जा सके जिन्होंने इस गेम को अपने फायदे के गेम क़ी तरह इस्तेमाल कर आम जनता के लिए इस गेम के मायने ही बदल कर रख दिया है /
Monday, March 22, 2010
महिला सशक्तिकरण-सेक्स और भ्रष्टाचार -------------------
महिला सशक्तिकरण कि बात करने वाले ये कौन लोग है ? कहिं ये वो ही लोग तो नहीं जो क्या महिला ,क्या बच्चा ,क्या नौजवान और क्या बूढा हर किसी को इस देश में कमजोर करने ,मजबूर बनाने और सत्ता में बैठे मजबूरों के अस्मिता तक का सौदा करने वालों के पास जाने को मजबूर करने का काम करते हैं ? मुझे शर्म आती है यह पूछते हुए कि कहाँ चले जाते हैं ये लोग जब रुचिका के मरने के १९ साल गुजर जाने के बाद भी उसके आत्महत्या के लिए जिम्मेवार व्यक्ति को सजा नहीं मिल पाती है? कहाँ चले जाते हैं ये लोग जब किसी महिला के साथ बलात्कार करने वाला कोई ऊँची पहुँच वाला होता है ?कहाँ चले जाते हैं ये लोग जब एक बच्ची अपनी शिक्षा पूरी करने के लिए किसी कि मजबूरी का सौदा करने वाले के हाथों अपना सब कुछ बेचने को मजबूर हो जाती है ? आज असल मुद्दा यह नहीं कि संसद में १०० में से ३० महिलाएं हों,असल मुद्दा तो यह है कि जो महिला उच्च संबैधानिक पदों पर बैठी है ,क्या वह उन पुरुषों के दबाब के बिना काम कर रही है जो पुरुष हमेशा महिलाओं के सशक्तिकरण के नाम पर उनका इस्तेमाल अपने फायदे के लिए करता रहा है ? हालाँकि कुछ अपवाद हैं जैसे किरण बेदी ,मेघा पाटकर इत्यादि जिन्होंने न सिर्फ पुरुषों बल्कि जीवन में अपने उसूलों के खातिर बड़ी से बड़ी चुनौतियों के सामने कभी भी घुटने नहीं टेका / ऐसा जज्बा तो मर्दों में भी कम ही देखने को मिलता है / अब सवाल उठता है कि महिलाओं का असल में सशक्तिकरण कैसे होगा ? महिलाओं को कमजोर करने वाले कारण कौन कौन से हैं ? जबाब है भ्रष्टचार एक प्रमुख कारण है महिलाओं के कमजोरी और बाजारीकरन का ,क्योंकि ज्यातर मामलों में भ्रष्ट लोग ,जिनके पास दो नंबर का पैसा होता है ,और जिनको यह गुमान होता है कि वे पैसे के दम पर हर गुनाह से बचकर निकल जायेंगे ,ऐसे लोग ही महिलाओं के साथ ज्यादा कुकर्म करते है क्योंकि हमारे देश कि व्यवस्था ऐसे लोगों को सजा देने में या तो बहुत देर करती है या दे ही नहीं पाती है / हमारे देश में महिला आयोग से लेकर महिला कल्याण मंत्रालय तक ऐसे लोगों के सामने लाचार दिखती है /आज जरूरत है कागजों में नहीं बल्कि जमीनी स्तर पड़ हर राज्य का महिला आयोग और महिला कल्याण मंत्रालय महिलाओं के हर शिकायत पर तुरंत और सख्त से सख्त सजा दोषियों को दिलाने के लिए सही और ठोस उपाय करे और बिना किसी भेद भाव के हर पीड़ित महिला को उसके द्वार पर जाकर सहायता और सहानभूति प्रदान करे /सिर्फ ऐ सी दफ्तर में बैठने,फाइल बनाने और बनाकर रखने से महिलाओं का सशक्तिकरण नहीं होगा / महिलाओं के हर उस शिकायत जिससे उसकी अस्मिता जुडी हो पर, पूरे देश में और देश के हर अदालत में एक साल के के भीतर सुनवाई पूरी कर कार्यवाही करना जरूरी बना दिया जाय/ बृद्ध महिला,विधवा महिला और असहाय महिलाओं को पेंशन के लिए बैंक या किसी दफ्तर नहीं जाना परे बल्कि उनके घर ये सारी सरकारी सुविधाएँ पहुँचाना किसी भी जिला प्रसाशन के लिए जरूरी बना दिया जाय/महिलाओं के लिए कुछ सरकारी विभागों में 60 प्रतिसत तक आरक्षण होना चाहिए मसलन शिक्षा,बैंक,समाज कल्याण और महिलाओं के कल्याण से जुड़ें सभी विभाग तथा महिला कल्याण मंत्रालय इत्यादि /गाँव हो या शहर हर थाने में दो महिला अधिकारी जरूर हो /महिलाओं कि शिक्षा सरकारी या गैर सरकारी स्कूलों में पूरी तरह मुफ्त हो /जिन माता पिता को सिर्फ दो बेटीयां हो उसे राष्ट्रीय गौरव योजना की शुरूआत कर हर महीने १०००रूपया कि प्रोत्साहन राशी प्रदान कि जाय /ये कुछ ऐसे जमीनी उपाय है जिससे सही मायने में महिलाओं का विकास होगा / अब रही बात महिलाओं को बाजारीकरण में प्रयोग करने वाले लोगों के खिलाफ कार्यवाही कि तो इस दिशा में सख्त नियम कायदे बनाने कि जरूरत है जिसे महिला संगठनों और स्वयंसेवी संस्थाओं से सुझाव मंगवाकर तैयार किया जा सकता है ,जिससे सीमेंट के प्रचार में सीमेंट कि गुणवत्ता कि जगह महिलाओं के मांसल सौन्दर्य का घिनौना प्रदर्शन करने और अपने फायदे के लिए महिलाओं कि असुरक्षा को बढाने वालों पर नकेल कसा जा सके /मुझे तो भारतीय मिडिया के लाचारी पड़ आश्चर्य होता कि ऐसे विज्ञापन के खिलाफ आवाज उठाने के वजाय उसे पैसे के लिए प्रशारित करने का काम कर महिलाओं का अपमान करती है / आज पैसे के लिए हर किसी कि अपनी अपनी दलील हो जाती है ,लेकिन हम आपसे अपेक्षा करते है कि आपकी दलील इस ब्लॉग पड़ महिलाओं के सच्चे हित में होगा /
Saturday, March 20, 2010
श्रीमती किरण बेदी को मुख्य सूचना आयुक्त नहीं बनाया गया तो देश में पहले से ही बदहाली में चल रहे सूचना का अधिकार कानून और कमजोर हो जाएगा -------------
मुख्य सूचना आयुक्त श्री वजाहत हबिबुल्लाह का कार्यकाल २४ अक्टूबर २०१० को आपना पाँच साल पूरा करता लेकिन वे ३० सितम्बर२०१० को ही ६५ साल के हो जायेंगे / इसलिए देश को उससे पहले एक नए मुख्य सूचना आयुक्त की जरूरत पड़ेगी,जिसके लिए आमिर खान(मशहूर फिल्म अभिनेता) ने श्रीमती बेदी का नाम प्रधान मंत्री श्री मनमोहन सिंह को पत्र के जरिये सुझाया था ,जिसे श्रीमती बेदी ने भी मीडिया में यह कहते हुए स्वीकारा भी था की -अगर सरकार मुझे मुख्य सूचना आयुक्त बनाती है तो मैं खुशी से यह पद स्वीकार करूंगी और आयुक्त को मिलने वाला मासिक वेतन भी नहीं लूंगी /भारत सरकार के लिए और देश की जनता के लिए इससे अच्छी बात क्या हो सकती थी /लेकिन इस देश भारत और इसकी जनता की फ़िक्र किसको है /प्रधान मंत्री ऑफिस अभी तक पता नहीं किस धुन में लगा है जो इतने गंभीर मुद्दे पड़ देश को अपना फैसला बता पाने में असमर्थ दिख रहा है /जबकि सारा देश यह जानने को बेताब है की मनमोहन सिंह जी के पास श्रीमती बेदी से ज्यादा उपयुक्त और कौन सा आइ ए एस या आइ पी एस है जो देश का मुख्य सूचना आयुक्त बनने के लायक है /प्रधान मंत्री को देश के जनता के प्रति जवाबदेहि के तहत ये जरूर बताना होगा और चाहिए भी कि श्रीमती बेदी जैसे बेहद इमानदार नाम पर मुख्य सूचना आयुक्त कि मुहर लगाने में इतनी देरी क्यों ? जबकि ऐसा करने से श्रीमती बेदी का कद बढ़ता या नही ? पड़ श्री मनमोहन सिंह और मुख्य सूचना आयुक्त के पद कि गरिमा का कद जरूर बढ़ जाता / आप अपने विचारों के जरिये देश के इस गंभीर पद और मुद्दे पड़ अपनी ऍफ़ आई आर इस ब्लॉग पड़ दर्ज करने के साथ- साथ देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को पत्र द्वारा अपने विचारों को बताने का कष्ट करें ---------------
सतीश शेट्टी के हत्यारों को फाँसी दो ------------------
अब कलम के पुजारियों और सच्चे देश भक्त पत्रकारों (वैसे तो असल में पत्रकार कहलाने का हक़ हर उसी व्यक्ति को है जो देश भक्त और निडर हो)को कलम के साथ तलवार भी रखना होगा क्योंकि निड़र और देशभक्त लोगों को भी अपना और अपने आत्म सम्मान की रक्षा का अधिकार है / आज हर तरफ पत्रकारों को धमकाया और डराया जाता है /सामाजिक कार्यकर्त्ता और सुचना के अधिकार का प्रयोग कर रहे लोग ,सही मायने में देश के जाँच एजेंसियों के अधिकारीयों का काम करके देश के स्वेत रक्त कण (हमारे देश की जाँच एजेंसियाँ) को देश को गंभीर बीमारी से लड़ने में ,देश की व्यवस्था जो पूरी तरह सड़ चुकी है को थोड़ी बहुत सहायता पहुंचा रही है,जिससे देश में इंसानियत जिन्दा है ,वैसे तो इसे मारने की पूरी तैयारी उन देश के गद्दारों द्वारा कर ली गयी है जो- हैं तो हिन्दुस्तानी ,खाते है हिंदुस्तान का,बैठे है देश के तथाकथित कर्ता-धर्ता बनकर लेकिन उनका देश और देश के लोगों के हितों से दूर -दूर तक कोइ वास्ता नहीं है / अगर वास्ता होता तो तालेगांव दबहाड़े,पुणे के पास देश के सुरक्षा का एक स्वेत रक्त कण(सतीश शेट्टी) की हत्या देश में हर तरफ चोरी और बईमानी का जाल बनाने वाले देशद्रोहियों द्वारा करा दी गयी और लगभग तीन महीने बाद भी ऐसे जघन्य अपराध करने वालों को नहीं पकरा जाना समूचे महाराष्ट्र के लिए ही नहीं बल्कि पूरे देश और उसकी व्यवस्था के लिए शर्मनाक है / दरअसल व्यवस्था में बैठे लोग सतीश शेट्टी के हत्यारों के बारे में नहीं जानते ऐसा नहीं है,बल्कि व्यवस्था में बैठे भ्रष्ट लोगों के इशारों पे ही हत्या सोची समझी साजिश और देश की व्यवस्था को पटरी पर लाने वाले देश व्यापी आन्दोलन को कमजोर करने के लिए की गयी /अतः देश के पत्रकारों और समाज सेवको से हमारा आग्रह है की अपने खोजी पत्रकारिता को निडर होकर अंजाम तक पहुँचाने के लिए,अपनी रक्षा के लिए और सतीश शेट्टी जैसे आज के निडर स्वतंत्रता सेनानियों की रक्षा के लिए कलम के साथ तलवार भी रखें / अपनी रक्षा किसी देशद्रोहियों से करने के लिए उस पर वार करना सदाचार की श्रेणी में आता है / हमारा आग्रह ऐसे इमानदार आई पी एस अधिकारीयों से है की -मानवता और इंसानियत को जिन्दा रखने के लिए सतीश शेट्टी के हत्यारों को जल्द से जल्द पकर कर उसे फाँसी की सजा दिलवाने के लिए ठोस सबूत अदालत में पेश करें / इसके लिए समूचा देश उनका आभारी रहेगा / सभी ब्लोगरों से हमारा आग्रह है की सतीश शेट्टी के हत्यारों को पकरने के लिए अपने ब्लॉग के जरिये आन्दोलन चलाएं और महाराष्ट्र के मुख्य मंत्री को ई मेल करें,जिससे सतीश सेट्टी जैसे लोगों को सम्मानित कर हमेशा लोगों के दिलों में जिन्दा किया जा सके और ऐसे लोगों पर हमला करने वालों को सख्त से सख्त सजा दिलाया जा सके /
Sunday, February 21, 2010
देश और समाज का सुरक्षा-चक्र


किसी व्यक्ति की गारंटी क्या होती है? जवाब होगा-उस व्यक्ति का खुद का जमीर और उसकी अंतरात्मा। इसलिए,मेरा मानना है कि एक साधारण व्यक्ति भी प्रधानमत्री से ज्यादा अच्छी जनकल्याणकारी नीति बना सकता है- अगर उसका जमीर और अंतरात्मा जिंदा है। एक प्रधानमंत्री का जमीर और उसकी अंतरात्मा अगर मर गई हो तो वह किसी भी देश को नर्क बना सकता है। इसलिए,हर सरकारी घोटालों और ख़र्चों की सामाजिक जांच आज बहुत जरूरी हो गयी है-ख़ासकर तब जब ग़लत नीतियों और भ्रष्ट मंत्रियों के निहित स्वार्थ की वजह से ज्यादातर लोग अपनी मूलभूत जरूरतों को पूरा करने के लिए गलत रास्ते पर जाने-अनजाने चलने को मजबूर हैं या किए जाते हैं। इसके साथ ही,सच बोलने वाले लोग, सत्यमेव जयते की रक्षा करने वाले लोग,तर्कसंगत न्याय-तर्कसंगत व्यवहार को बढाने वाले लोग,भ्रष्टाचार को अपनी जान की परवाह किए बगैर पूरी तरह ख़त्म करने के लिए आंदोलनरत लोग और सूचना के अधिकार के लिए कार्य कर रहे लोग-ये लोग ऐसे सुरक्षा-चक्र हैं,जिनकी रक्षा हर देश और समाज को किसी भी कीमत पर करनी चाहिए। ऐसे लोगों की सुरक्षा और सहायता के लिए अगर देश के रक्षा बजट के बराबर भी धन ख़र्च करना पड़े तो करना चाहिए। देश भर मे,ऐसे लोगों द्वारा उठाए गए मामलों पर और इनके नेक काम मे इनके उपर हमला तक कर के व्यवधान पहुंचाने वालों के ख़िलाफ़ त्वरित फैसले के लिए कम से कम 200 प्रबुद्ध पत्रकारों,अन्ना हजारे,अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया जैसे समाजसेवकों और ईमानदार जजों का संयुक्त पैनल होना ही चाहिए । जो देश ऐसे लोगों की सुरक्षा नही करता उस देश का भविष्य निश्चय ही अंधकारमय है। भारत जैसे लोकतंत्र मे अगर एक सच्चे व्यक्ति के साथ अन्याय होता है तो वह देशद्रोह से कम नही है क्योंकि हमारे देश के राष्ट्रीय चिह्र मे "सत्यमेव जयते" लिखा है। आज हर जगह,पूरे देश मे,सच बोलने वालों को परेशान किया जाना पूरे देश और लोकतंत्र के लिए शर्मनाक बात है। एचपीआरडी इंडिया डॉट ओआरजी एक आंदोलन है-पूरे देश को एकजुट होकर आज के स्वतंत्रता-सेनानी और हमारे देश-समाज के रखवाले(सच बोलने वाले) को सुरक्षा और सहायता पहुंचाने का । असल मे,आतंकवादी तो वे लोग हैं जो सच्चे-अच्छे-ईमानदार-न्यायसंगत-तर्कसंगत और अहिंसक व्यवहार वाले लोगों को परेशान करने का अक्षम्य अपराध करते हैं। हमारे देश की सरकार अगर इस ओर सोचना प्रारंभ कर दे तो कानून-व्यवस्था आज से ही सुधरने लगेगी जिससे हर इंसान के साथ-साथ देश और समाज का संतुलित विकास होगा।अगर आप पूरे देश के किसी भी हिस्से मे सच बोलने और ईमानदारी को अपनाने की वजह से परेशान किए जा रहे हैं या ऐसे सत्यवक्ताओं और ईमानदार लोगों की सुरक्षा और सहायता का काम कर रहे हैं तो निश्चय ही देश और समाज आप का एहसान कभी नही भूलेगा। आप जैसे लोगों की हमें पूरे देश, हर गली,हर शहर और हर मोहल्ले मे तलाश है जिन्हें एकजुट कर एक मज़बूत कड़ी बनाकर देश और समाज मे तर्कसंगत बदलाव लाकर देश और समाज की सच्ची सुरक्षा की जा सके।
पोर्न वेबसाइट के ख़िलाफ एकजुट हों और जनमत तैयार करने में हाथ बटाएं जिससे हमारे देश के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के उच्च विचारों को समर्थन दिया जा सके और समाज मे नेट के जरिए फैल रही गंदगी को पूरी तरह ख़त्म किया जा सके।
सम्पर्क करें-09810752301
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