Sunday, May 2, 2010

रोमांचित करता हुआ ब्लोगरों का ये आक्रोश,हतासा और सहयोग के बढे हाथ ------आप भी पढ़िए !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!



आज मैं ,आप सभी ब्लोगरों के सामने ,ब्लॉग जगत के धुरंधर ब्लोगरों के टिप्पणियों में छुपी उनका आक्रोश, हतासा और सहयोग के बढे हाथ कि चर्चा ,इस पोस्ट के जरिये कर रहा हूँ ,जो मेरे ख्याल से ब्लॉग के जरिये इस देश में सार्थक बदलाव लाने कि दिशा में शुभ संकेत है / मुझे यह प्रस्तुत करते हुए अपार हर्ष का अनुभव हो रहा है / आपलोगों का अनुभव जानना चाहूँगा ?  
ये विचार दो हफ्ते में मेरे आग्रह पर ब्लोगरों ने मेरे एक पोस्ट पर व्यक्त किया है / पिछले हफ्ते अजित गुप्ता जी उम्दा विचार के लिए सम्मानित कि गयी थी / इस हफ्ते अदा जी को यह सम्मान दिया जा रहा है / वैसे सम्मान के हक़दार तो वे  सभी ब्लोगर है जो देश और समाज में बदलाव लाने कि सोच रहें हैं /अदा जी को बधाई ,साथ ही आग्रह है कि ,आप हमे अपना डाक का पता और संभव हो तो मोबाइल नंबर मुझे इ मेल या मेरे मोबाइल पर फोन कर मुझे बताने का कष्ट करें ,जिससे हम आपको सम्मान पत्र और इनाम का चेक भेज सकें / मेरा मोबाइल नंबर और इ मेल मेरे ब्लॉग से आपको मिल जायेगा /


हमने देश हित में विचारों और सुझावों के लिए एक मुहीम चलाया हुआ है ,जिसमे उम्दा विचारों और सुझावों को सम्मानित करने क़ी भी व्यवस्था है /


आप सबसे आग्रह है क़ी आप अपना बहुमूल्य विचार पोस्ट में उठाये गए मुद्दे के पक्ष,बिपक्ष या उस उद्देश से जुड़े अन्य बिकल्पों पर सार्थक विवेचना के रूप में अपना 100 शब्द जरूर लिखें / नीचे लिखे लिंक पर क्लिक करने से,वह पोस्ट खुल जायेगा जिसके टिप्पणी बॉक्स में आपको टिप्पणी करनी है /




Suman said...
nice



Udan Tashtari said...
विचारणीय- गंभीरता से मनन करने योग्य. विचार करके पुनः आते हैं.



Bhavesh (भावेश ) said...
अच्छा प्रारूप. लेकिन अफ़सोस अपने देश में गुंडे छाप नेताओ के रहते इसे अमल लाना संभव नहीं है. मेरे विचार से १. केवल प्रश्न पूछने से ही अपने कर्त्तव्य की इतिश्री नहीं हो जाती. प्रश्नकर्ता और उत्तर देने वालो की जवाबदेही भी बहुत जरुरी है. २. मुफ्त रेल पास इत्यादि का भी कोई खास औचित्य नहीं है क्योंकि मुफ्त में मिलने वाली चीजों से ही व्यक्ति भ्रष्ट होता है और मुफ्त की चीज़ ही सबसे महँगी होती है.



honesty project democracy said...
BHAVESH JI SOCH WICHAR KAR AASANKA JAHIR KARNE KE LIYE DHANYWAD.YHAN MAIN AAPKI AASHANKA DUR KARNE KE LIYE ITNA HI KAHUNGA KI "JAB SARE DESH KE DESH BHAKT EK JUT HO JAYEN,TO EK LAKH DESH BHAKT BHI IS DESH KE SARE GUNDA TYPE NETAON AUR UNKE CHMCHON PAR BHARI PARENGE"



गिरीश बिल्लोरे said...
सहमत हूं



प्रवीण पाण्डेय said...
बहुत अच्छा विचार है ।



ajit gupta said...
जब देश में राजशाही थी तो यह अनुभव किया गया कि लोकतंत्र आना चाहिए। स्‍वतंत्रता के बाद भारत में लोकतंत्र आ गया अर्थात नौकरशाहों के ऊपर जन-प्रतिनिधि बैठ गया। लेकिन धीरे-धीरे यह जन-प्रतिनिधि जिसे आज गाली के रूप में नेता का प्रयोग करते हैं, ही सर्वाधिक भ्रष्‍ट हो गया। नौकरशाहों और नेताओं के भ्रष्‍टाचार से त्रस्‍त जनता के सामने मीडिया आया। अब मीडिया ही सर्वाधिक भ्रष्‍ट हो चला है। इसलिए इस देश में समाज को सुधारने की आवश्‍यकता है। केवल प्रश्‍न पूछ लेने से काम नहीं चलेगा। इसके लिए जैसा आपने एक लम्‍बी-चौड़ी प्रक्रिया बता दी, तो एक एजेन्‍सी खोलनी पड़ेगी और फिर नवीन भ्रष्‍टाचार। भारत में जब तक लोकपाल विधेयक को मंजूरी नहीं मिलती तब तक इस देश का भ्रष्‍टाचार समाप्‍त नहीं हो सकता। आज भी हमारे देश में अंग्रेजों का ही कानून लागू है, उसके तहत सारे ही राजनेता, नौकरशाह कानून से ऊपर हैं। उन्‍हें सीधे ही सजा नहीं हो सकती। इसलिए अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि लोकपाल विधेयक में प्रधान मंत्री को भी लेना चाहिए और अब्‍दुल कलाम ने तो कहा था कि उसके घेरे में राष्‍ट्रपति भी आना चाहिए। लेकिन यह बिल कभी भी पास होने की स्थिति में नहीं आता। इसलिए कुछ मूलभूत मुद्दों पर परिवर्तन हो जाए तो देश का कायाकल्‍प हो सकता है लेकिन इसके लिए ना तो नौकरशाह फाइल को आगे बढ़ाने देंगे और ना ही राजनेता उस पर अमल करेगे। केवल जनता ही दवाब बना सकती है।



Amit Sharma said...
This post has been removed by the author.



Tarkeshwar Giri said...
Bahut accha lekh hai. Main aapke sath hun.



Tarkeshwar Giri said...
दुध की सफेदी काली पड़ने लगी है। क्योंकि दिन प्रतिदिन दुध के दामो मैं उछाल आ रहा है। दुध है की पानी -पानी होता जा रहा है और लोग कमा -कमा के काले हुए जा रहे हैं। अब लोग करे भी तो क्या करे । बिना दुध के काम भी तो नहीं चलने वाला है। सुबह उठते ही घर के बड़े चाय और बच्चे दुध की मांग शुरू कर देते हैं। दुध बेचने वाली कंपनिया मोटी काट रही है। क्योंकि उन्हें पता है की बिना दुध के काम तो चलने वाला नहीं है। सरकार अपने आप में मस्त है उसे अभी फ़िलहाल कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है। क्योंकि वो पूरी तरह से बहुमत में है। और चुनाव अभी बहुत दूर है। आखिर चुनाव के लिए चंदा तो येही कंपनिया ही देंगी ना। आखिर विरोध करे तो करे कौन। शायद हम और आप मिल कर के इसका विरोध कर सकते हैं। सड़क पर खड़े हो कर के नारे लगाने की कोई जरुरत नहीं है और न ही कोई नई पार्टी बनाने की जरुरत है। इसका विरोध तो हम अपने -अपने घरो में बैठ कर के ही कर सकते हैं। बस करना ये ही है की हमें हफ्ते में किसी भी एक दिन दुध का घर बैठे बहिष्कार करना होगा। उस दिन कोई भी चाय या कोफ़ी नहीं पिएगा। बच्चो को उस दिन दुध की जगह ताजे फलो का रस पिलाना होगा। फिर देखिये कैसे दुध बेचने वाली कंपनियों की आँखे खुलती है। अगर हमने मिलकर के सिर्फ हफ्ते में एक दिन दुध का बहिष्कार कर दिया तो इन कंपनियों की ऐसी की तैसी हो जाएगी। और अब करना पड़ेगा। अगर आप सभी लोग चाहते हैं की महंगाई रुके तो।



देव कुमार झा said...
विचार आन्दोलित करते हैं... कुछ करने का आदेश देते हैं...



अजय कुमार झा said...
मुझे लगता है कि ये मुद्दा इतना सहज नहीं है इसलिए इस पर अपे्क्षित टीप , योजना के लिए एक रूप रेखा और बहुत सी विस्तृत बातें हैं कहने वाली अलग से टिप्पणी करने आता हूं ।



Aseem Trivedi said...
अच्छा विचार है, सूचना के अधिकार कि तरह ही हमारे लोकतंत्र के विकास में मील का पत्थर साबित हो सकता है. इस तरह के तरीके निकालने कि आवश्यकता इसीलिये पड़ती है क्योकि हम अच्छे प्रतिनिधि नहीं चुन पाते. पता नहीं हम इतने सक्षम कब होंगे कि धर्म, जाती, संप्रदाय से ऊपर उठ कर चुनाव कर सकें. पता नहीं कब पढ़े लिखे लोग कब राजनीती कि और रुख करेंगे और कब तक हमें कदम कदम पर अपने अधिकार मांगने के लिए संघर्ष करना पड़ेगा. इस दिशा में इतना सोचने और एक रास्ता निकालने के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद....! आशा है कि इस दिशा में आगे प्रयास हो सकेगा.



काजल कुमार Kajal Kumar said...
आइडिया तो अच्छा है पर बिल्ली के गले में घंटी बांधेगा कौन



honesty project democracy said...
काजल कुमार जी आप अपने बहुमूल्य विचार और सुझाव तो रखिये १०० शब्दों में ,फिर हम सब मिलकर जैसे देश को आजादी दिलाये थे , उसी तरह बिल्ली के गले में घंटी भी बांध देंगे और इन भ्रष्टाचारियों से देश को मुक्ति भी दिला देंगे / बस जरूरत है मतभेद भुलाकर एकजुट होने की /



रेखा श्रीवास्तव said...
प्रजातंत्र में जनता कि सरकार जनता के लिए कही जाती है किन्तु हम तो हर बार ठगे जाते हैं. ये जानकर भी ये हमारे जनप्रतिनिधि दुबारा नहीं नजर आनेवाले . संसद में सिर्फ महीने कम हैं ये दो महीने साल में मांग रहे हैं या फिर पूरे संसद के कार्यकाल में. संसद में हर सत्र में कुछ दिन होने चाहिए जिसमें जनता सीधे सवाल पूछ सके. उसका माध्यम जो भी रखा जाए. अब इस प्रजातंत्र के वर्त्तमान स्वरूप में ये आवश्यक हो गया है कि निरंकुश सांसदों को पांच साल के लिए ये लाइसेंस न दे दिया जाय. अगर चुना गया प्रतिनिधि अपनी जनता का प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ है तो जनता को सामने आने का अधिकार भी होना चाहिए क्योंकि कितने सांसद तो सिर्फ नाममात्र के सांसद होते हैं. १८ वर्ष के मतदाताओं के लिए ये चुनाव क्या अर्थ रखता है? अगर फ़िल्म अभिनेता सामने है तो उसे उसका ग्लैमर दिखाई देता है और वह चुन कर आ भी जाता है. फिर वह सिनेमा और संसद के बीच न्याय नहीं कर पाता है. कुछ को तो सम्पूर्ण कार्य काल में भी एक भी प्रश्न पूछने या फिर अपने क्षेत्र कि समस्या को प्रस्तुत करने की आवश्यकता ही महसूस नहीं होती है. अब संसद में जनता कि भागीदारी इस रूप में अत्यंत आवश्यक हो चुकी है. इस तरह से जनता की प्रश्न प्रहार में साझीदारी न सिर्फ सरकार में विश्वास को बढ़ाएगी बल्कि ये जनप्रतिनिधि निरंकुश बादशाह होने के अहसास से भी मुक्त हो सकेंगे. चुनाव में मतदान के प्रति जो निराशा और उदासीनता आज एक बड़े तबके में है , उसका शमन हो सकता है और फिर प्रतिनिधि का चुनाव पार्टी के नाम पर नहीं बल्कि उसके अपने व्यक्तित्व और कृतित्व के अनुसार ही होगा.



विजय प्रकाश सिंह said...
भ्रष्टाचार का विषय बहुत ही व्यापक है , यह नया भी नहीं है । आचार्य चाणक्य से लेकर अलाउद्दीन खिलज़ी , फ़िरोज़ शाह ने लेकर राबर्ट क्लाइव और जवाहर लाल नेहरू से लेकर राजीव गांधी तक भ्रष्टाचार के किस्से भरे पड़े हैं । क्राइम फ़ॉर पैशन और क्राम फ़ॉर मनी ही मुख्य अपराध होते हैं । इस विषय पर बहुत विस्तृत पोस्ट फिर कभी लिखेंगे । धन्यवाद ।



boletobindas said...
दशा सही में विचारनीय है देश की..देश की राजधानी में जब स्थिती खराब है तो बाकी जगह के बारे में बात करना बेमानी है। हर व्यक्ति जहां सत्ता में है, नौकरी में है, वहीं पर भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने पर जुटा है। पर सिर्फ सवाल पूछने से कुछ नहीं होगा। जनता को दवाब बनाना ही होगा, तभी कुछ हो पाएगा। आज देश की राजधानी के अस्पतालों में, शिक्षण संस्थानों में आसपास दूर दराज के लोग आते है. क्योंकी वहां स्वास्थ्य औऱ शिक्षा की सुविधा उपलब्ध नहीं है। सवाल पूछने के लिए दिल्ली आने की कोई जरुरत नहीं है। सभी सांसदों को अपने ही इलाके में सवाल का जवाब देने की व्यवस्था करनी होनी चाहिए। बीमार पड़ने पर अपने ही जिले के स्वास्थ्य केंद्रों पर नेताओं को इलाज करना चाहिए। ताकि उन्हें पता चले की वहां के हालात कैसे है। उनके बच्चे प्राइवेट स्कूलों में क्यों पढ़ते हैं, क्योंकी सरकारी स्कूल की स्थिति बिगाड़ी हूई है नेताओं ने। हर नागरिक को जबतक अपने ही इलाके में मूलभूत सुविधाएं नहीं मिलती तब तक कुछ नहीं हो सकता। हर काम के लिए दिल्ली भागने की आदत नहीं होनी चाहिए। सवाल पूछने के लिए अगर दिल्ली आना पड़े तो क्या फायदा। नेता जब वोट मांगने दरवाजे पर आते हैं. तो वोटर को अपने प्रशन का उत्तर भी अपने घर पर न सही, अपने इलाके में मिलना ही चाहिए। ठीक है कि भ्रष्टाचार को खत्म नहीं किया जा सकता पर उस पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकता है, ताकी उसकी मार से जनता त्राही त्राही न करे। यही स्थिती हर क्षेत्र में लायी जा सकती है।



Vishal Kashyap said...
काफी विचाराधीन समस्या और गंभीर सोंच, काश इस सोंच को यथार्थ मिले .........



संजय कुमार चौरसिया said...
aaj ek aam insan kathputali ban ke rah gaya hai, jab hum doosron ke isaare par nachna band kar denge, tabhi yah andolan aage badega, badiya prastuti ke sath ek sandesh jis par hum sabhi ko amal karna chahiye aapko dhnyvad



BrijmohanShrivastava said...
जनता के प्रश्न स्वम जनता पूछेगी तो प्रश्न पूछने के जो पैसे लिए जाते है वे किसको मिलेंगे |सर जी मेरा तो कहना यह है की "अपने माहोल पे इल्जाम लगते क्यों हो ?तुमने खुद राह्जनों को नए चहरे बख्शे अब लुटे हो तो लुटो शोर मचाते क्यों हो | बुलबुलें खुश थी खुशियों के तराने गाये ,लेके खारों से achchhon को चमन सौंप दिया ,शीश dhuntee है अब फूलों kee ye ghaayal khushboo, ye तुमने kyaa kiyaa ye kisko चमन सौंप दिया



जी.के. अवधिया said...
"प्रश्न काल के लिए साल में दो महीने आरक्षित होना चाहिए, जिसमे सिर्फ जनता को मंत्रियों और अपने जनप्रतिनिधियों से प्रश्न पूछने का अधिकार होगा और संसद के सभापति जनता के प्रश्न काल को संचालित करेंगे ..." भ्रष्टाचारी लोग इसमें भी भ्रष्टाचार का रास्ता निकाल लेंगे। देश में व्याप्त भ्रष्टाचार की जड़ तो वास्तव में हमारी कुशिक्षा है। देश के स्वतन्त्र हो जाने के बाद भी हमारी अपनी कोई शिक्षानीति नहीं बनी और हम आज तक अंग्रेजों की बनाई शिक्षनीति, जिसका उद्देश्य ही भ्रष्टाचार को बढ़ा कर भारत को लूटना था, को ही कुछ फेरबदल के साथ अपनाये हुए हैं। जरूरत है तो हमारी अपनी शिक्षानीति को जो अपनी संस्कृति, सभ्यता और राष्ट्र के प्रति समर्पण सिखाये। शिक्षा से ही संस्कार बनते हैं और संस्कार से विचार जो कि हमसे कर्म करवाते हैं। आज हम भ्रष्टाचार जैसे कर्म कर रहे हैं तो सिर्फ कुशिक्षा के कारण ही। अन्त में इतना अवश्य कहूँगा कि लोगों में जागरूकता बढ़ाने का आपका कार्य अत्यन्त सराहनीय है।



जगदीश्‍वर चतुर्वेदी said...
समस्या समय आवंटन की नहीं है,समस्या प्रश्नकाल और अन्य मौकों पर उठे सवालों पर सरकारी कार्यान्वयन की है। केन्द्र सरकार की इस मसले पर भूमिका जनविरोधी रही है।



विष्णु बैरागी said...
चरम आदर्शवादिता भरी, चरम आक्रोशवाली पोस्‍ट। भावना अच्‍छी है किन्‍तु आक्रोश, विवेक को विस्‍थापित कर देता है। हम लोग 'जनता' या 'प्रजा' ही बने रहना चाहते हैं, 'नागरिक' नहीं बनना चाहते। 'नागरिक' बनने पर लोकतन्‍त्र में भागीदारी निभानी पडती है, कुछ लोगों की नाराजी मोल लेनी पडती है। उसके लिए हममें से कोई भी तैयार नहीं। हम बिना कुछ खोए सब कुछ हासिल करना चाहते हैं। परिणामस्‍वरूप हमें कुछ भी हासिल नहीं हो रहा है और चीजें एक के बाद एक, हमारी मुट्ठी से निकलती जा रही हैं। देश को इस मुकाम पर हम ही लाए हैं, यह अपने आप यहॉं नहीं पहुँचा। हम अपने नेताओं को नियन्त्रित करने को तैयार नहीं। उन्‍हें खुली छूट देकर उनसे अपनी स्‍वार्थ सिघ्दि की प्रत्‍येक गुंजाइश कायम रख्‍ना चाहते हैं। सब कुछ सम्‍भव है यदि हम तय कर लें, दूसरे के कुछ करने की प्रतीक्षा छोड कर खुद करने में लग जाऍं, कुछ खोने को तैयार हो जाऍं और लोकतन्‍त्र को अधिकार ही नहीं, जिम्‍मेदारी भी मानना शुरु कर दें। कामयाबियॉं हमारे कदम चूमने को बेकरार हैं, हम ही कदम बढाने को तैयार नहीं।



आनन्‍द पाण्‍डेय said...
मेरे विचार से इतना कुछ करने की आवश्‍यकता ही नहीं पडेगी अगर मात्र कुछ नियम लगा दिये जाएं । पहले तो सभी नेताओं की सैलरी सामान्‍य कर्मचारियों जितनी ही हो और किसी भी नेता चाहे वह प्रधानमंत्री ही क्‍यूं न हो की अधिकतम् सम्‍पत्ति 10 लाख से अधिक होने पर उन्‍हे अपदस्‍थ करके उनकी सारी सम्‍पत्ति राजकोष में जमा कर दिया जाए। दूसरी बात- सभी नेताओं के ऐशोआराम की व्‍यवस्‍था बिलकुल ही सामान्‍य जनता की तरह हो। क्‍यूकि गद्दी उन्‍हे जनता की सेवा के लिये मिलती है सो सच्‍चे सेवक के पूरे लक्षण हों। उन्‍हे भी सामान्‍य गड्ढे वाले सडकों पर विना ए सी वाली गाडी से ही क्षेत्रों का दौरा अनिवार्य हो तब जाकर वो सडकों और अन्‍य अव्‍यवस्‍‍थाओं की तरफ ध्‍यान देंगे। चुनाव लडने की न्‍यूनतम योग्‍यता स्‍नातक हो तथा चुनाव का आवेदन देने के बाद उन्‍हें भी सिविल आदि की तरह परीक्षाएं देनी पडें, इससे शाशन की बागडोर योग्‍य व्‍यक्ति के हाथ आएगी। चुनाव लडने वाले पर कोई भी अपराधिक मामला दर्ज न हो और इसकी पुष्टि उसके लोकल थाने से की जाए। चुनाव लडने वाला व्‍यक्ति चुनावी गतिविधि के लिये राजकोष का पैसा न लगा सके और एक निश्चित राशि तक ही खर्च कर सके। जनता को ये अधिकार हो कि जब चाहे वो सर्वकार से जबाब तलब कर सके फिर चाहे किसी भी संचार माध्‍यम से क्‍यूं नहो। कोई भी नेता किसी भी निर्माण कार्य के पहले पूरी जनता से एस एम एस ओटिंग कराये कि जनता की उसपर राय क्‍या है, और यह ओटिंग फ्री हो। इस तरह से और भी बहुत सी बातें लागू करनी होंगी पर सबसे पहले अगर ये उपरोक्‍त नियम लागू हो गये तो नेताई में गुण्‍डागर्दी तो शर्तिया कम हो जायेगी।



lokendra singh rajput said...
लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि होती है... और हम जो भी विकास करना चाहते है उसके मूल में जनता ही तो है... सो जनता को सवाल उठाने का पूरा हक है... बेहतर बात उठाई है, ये होना ही चाहिए.... और इसके लिए हमे मिल का प्रयास करने होंगे....



'अदा' said...
मुझे इस बात की बहुत ज्यादा कोफ़्त होती है, जब बिना प्रयास किये हुए यह मान लिया जाता है कि यह काम तो हो ही नहीं सकता है.... आपका यह प्रश्न " क्या आप समझते हैं कि जनता को सरकार को संयुक्त हस्ताक्षर अभियान के जरिए,आदेश देने का अधिकार है?" बिलकुल हो सकता है और होना भी चाहिए....लोकतंत्र का अर्थ ही है जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा.....लेकिन जब जनता को ही अपनी शक्ति का भान नहीं है तो कोई क्या करे...मुट्ठी भर भ्रष्ट नेताओं की दुहाई देने वाले या तो डरपोक है या निकम्मे, जब समाज को बदलना है तो भिड़ जाना ही होगा, अगर हम सोच लें तो क्या यह संभव नहीं है....गाँधी जी सत्याग्रह के बल पर अंग्रेजी हुकूमत को घुटने पर ले आये थे और हम गाँधी के देश में अपने ही लोगों की गुंडागर्दी से डर कर बैठे हुए हैं...आज पोलिटिक्स मात्र गुंडों का खेल होकर रह गया है...और इसके लिए जिम्मेवार हमारा तथाकथित माध्यम वर्गीय समाज है.... हमने हमेशा समस्याओं से बचके निकलना सीखा है...और बाद में वही समस्याएं विकराल रूप ले लेतीं है...फिर हम आराम से कहते हैं कि अब कुछ नहीं हो सकता है....वही हाल राजनीति का रहा है....राजनीति में जाना बुरी बात है....राजनीति बुरे लोगों का काम है, भले लोग राजनीति में नहीं जाते हैं ....यही तो सुनते रहे हैं बचपन से, और हमेशा हैरानी होती रही है मुझे कि , देश के किये काम करना कैसे बुरा हो सकता है ? हमारे बड़े बुजुर्गों ने सिर्फ मुसीबतों से बचने के लिए गलत छवि बना दी और हमने यकीन कर लिया....और यही सबसे बड़ा कारण है कि आज पोलिटिक्स में गुंडों का आधिपत्य है, हमलोग ये क्यूँ नहीं सोचते राजनीति भी एक करियर है...बच्चों को उसमें भी जाना चाहिए....हर नौकरी कि तरह यह भी एक नौकरी है...इसके लिए भी पाठ्क्रम होने चाहिए....नयी पीढ़ी को ट्रेनिंग मिलनी चाहिए....कितनी अजीब बात है एक पार्क तो खूबसूरत बनाने की ट्रेनिंग है,, बिल्डिंग को सजाने की ट्रेनिंग है ....और अपने देश को व्यवस्थित करने की कोई ट्रेंनिग नहीं ....लानत है जी... हमारे अपने लोग कितनी बड़ी-बड़ी अन्तराष्ट्रीय कंपनियों में अपने बुद्धि-विवेक से अपना आधिपत्य साबित कर चुके हैं....क्या वो लोग अपने देश में इस काबिल नहीं थे....?? जब हम अपने देश के विदेश मंत्रालयों के प्रवक्ताओं के देखते हैं और सुनते हैं तो आत्महत्या कर लेने का दिल करता है...लगभग २ अरब आबादी वाले देश में एक ढंग का प्रवक्ता नहीं मिलता इनको जो अपने देश की गिरती साख को सम्हाल सके....जो ढंग से बात कर सके....जो भी आता है शिफारिशी जोकर होता है..... अब समय आ गया है कि जनता जागे और अपनी ताकत को पहचाने...उसका उपयोग करें, अगर इस तरह के हस्ताक्षर अभियान की शुरुआत हो जाए तो फिर देश को सुधरने से कोई नहीं रोक सकता है....संसद में बैठे हुए जो लोग हैं उन्हें हमने चुना है....उन्हें वही करना होगा जो, हम चाहेंगे.....और जनता हमेशा सही ही चाहेगी....लोग कहेंगे 'अदा' सपने देखती है....ये नहीं हो सकता....तो उनसे मैं कहूँगी कि जब उस दिशा में कोई काम किया ही नहीं तो उसकी सफलता पर पहले से संदेह क्यूँ करना....?? अरे दिल्ली जाना है तो दिल्ली की गाड़ी में बैठो.....घर में बैठ कर भगवान् से मानना कि हमें दिल्ली पहुंचा दो...बेवकूफी है...या फिर बिना गाड़ी में बैठने का प्रयास किये हुए मान लेना कि हम तो दिल्ली जा ही नहीं सकते गलत होगा..... संयुक्त हस्ताक्षर करके कोशिश तो कीजिये ....आपके आदेश का पालन होगा अवश्य ये मेरा विश्वास है.....



Dr. shyam gupta said...
---फ़िर एक नया तरीका , भ्रष्टाचार के तालाब में और नई मछलियां डालने का --सिर्फ़ हर नागरिक अपना-अपना कार्य जो उसे मिला है या दिया गया है- सत्य, न्याय व उचित ढंग से, बिना कैश या काइन्ड लाभ सोचे , करे तो सब कुछ स्वयं ठीक होजायेगा; और तभी ठीक होगा और कोई राह नहीं है। ---एक कार्य में जितने अधिक लोग होंगे उतना ही अधिक भ्रष्ट-आचरण । कविता पढिये--- सुधार की इबारत ..... आजकल बाढ़ आई हुई है, सेवा ,देश सेवा ,समाजसेवा करने वालों व् - करनेवाली संस्थाओं की । सभी अपने- अपने ढंग से , कर रहे हैं ,सेवा , लिख रहे हैं ,सुधार की इबारत । पर सुधार है कहाँ ? कहीं नहीं ,क्यों ? सुधार की इबारत ,लिखना नहीं है , स्वयम को ही ,सुधार की , नींव बनाना होता है , सुधार की इमारत बनाना होता है। सुधार स्वयम के सुधार से होता है, क्या कोई कर पा रहा है ?



http://dr-mahesh-parimal.blogspot.com/ said...
मैं ही क्यों, देश का कोई भी सभ्य नागरिक आज तक यह नहीं समझ पाया कि आम आदमी का प्रतिनिधि वीआईपी क्यों होता है? इसके अलावा संसद में इतना हो-हल्ला होता है, सांसद संसद का बहिष्कार करते हैं, कई बार मार्शल को बुलाना पड़ता है। इतना कुछ होने के बाद जब सांसदों के वेतन या भत्ते बढ़ाने वाला विधेयक कब बिना शोरगुल के कैसे पास हो जाता है? आखिर हमारे प्रतिनिधि किस काम के एवज में इतनी सुविधाएँ लेते हैं? कितने ईमानदार नेताओं से आपका पाला पड़ा, कोई बता सकता है? लोकतंत्र के नाम पर देश की जड़ों को खोखला कर रहे हें, ये नेता, लेकिन हम कब समझ पाएँगे, यह नहीं जानते। देश में भ्रष्टाचार का कोई भी मामला हो, तो इन नेताओं की मिलीभगत सामने आती ही है। आखिर पद मिलने के बाद ये इतने स्वार्थी कैसे हो जाते हैं? मैं तो उस दिन का इंतजार कर रहा हूँ, जब कोई शिक्षक अपने शिष्य के नेता बनने के बाद खुश होए और उसके बाद उसके भ्रष्ट होने पर सरे आम उसकी पिटाई करे। मेरी एक ही चाहत है ऐसा दृश्य देखने की। कब समझेंगे, ये नेता आम आदमी का दर्द ? डॉ महेश परिमल



डा० अमर कुमार said...
निताँत अव्यवहारिक परिकल्पना, अपने अपने क्षेत्र के साँसदों से ज़वाबदेही तक ठीक है, जब हमने प्रतिनिधि चुना है, तो अलग से अपनी भागीदारी की माँग.. कानून व्यवस्था के लिये चुनौती होगी !



anoop joshi said...
सर जिस देश मे जनता के सवाल् पुछने के भी रुपया यहा के संसद सदस्य लेते है उन्हे कमाइ का दो आर्क्ष्सित् महिने मिल जयेङ्गे।



bhojpuriyababukahin said...
जनभ्रम कब दूर होगा? जन,जनसेवक और जनतंत्र... कहते हैं कि एक दूसरे के पूरक है. जन जल रहा है, जनसेवक मेवा खा रहे हैं और जनतंत्र में से जन गायब हो चुका है. तंत्र जन को लूट रहा है और जन भ्रम में जीए जा रहा है. उसको लग रहा है कि विकास हो रहा है, पेड़-पौधों को काटकर, झुग्गियों को जलाकर/उजारकर,जंगलपुत्रों पर आग बरसाकर, संसद में प्रश्न के बदले धन लेकर, आईपीएल में सट्टा लगाकर, मेडिकल कॉसिल में घपला कर के, शहीदों के विधवाओं को विलखता छोड़कर, संयुक्त और अब व्यक्तिगत परिवार को तोड़कर. ऐसे में जिन सांसदों से हम सवाल पुछेंगे क्या उनको मालुम नहीं होता कि उनके क्षेत्र की समस्या क्या है? मालुम होते हुए अगर वे वातानुकूलित हवा को छोड़कर चिलचिलाती धूप में पत्थर तोड़ती औरत की मुसिबतों को देखने के लिये नहीं आ सकते, तो इन सांसदों और विधायको से प्रश्न पूछ कर समय जाया करने से कोई फायदा हमे नजर नहीं आता. इन महानुभावों को संसद/विधानसभाओं में घेरने के बजाय उनके क्षेत्र में ही उनके कर्तव्यों के निर्वहन के लिये उन पर हर संभव दबाव बनाया जाए तो ज्यादा अच्छा होगा. आशुतोष कुमार सिंह दिल्ली zashusingh@gmail.com



टी.सी. चन्दर T.C. Chander said...
बेईमान-ईमानदार, भ्रष्ट-अभ्रष्ट, मेहनती-हरामखोर...सब अपना काम सदियों से करते आ रहे हैं। पर यह आशा सदा बनी रहती है कि एक दिन सब ठीक और सुन्दर हो जाएगा। आप लगे रहें, मैं भी पिछले लगभग ४ दशकों से लगा हुआ हूं और संतोष की बात यह है कि हमारा साथ देने वाले बहुत हैं। -कार्टूनिस्ट चन्दर/ www.cartoonpanna.tk



LIMTY KHARE लिमटी खरे said...
हम इस पवित्र पावन काम में पूरी तरह आपके साथ हैं हमारे योग्‍य जो भी हो निसंकोच हमें बताएं

Thursday, April 29, 2010

क्या ऐड वर्ल्ड बीमार ,मीडिया भूखा और कम्पनियों को अपने उत्पाद पे भरोसा नहीं------ ?

                                                             
आज बड़े-बड़े तथाकथित ब्रांड का दावा करने वाले ,चाहे वह मारुती हो,कोका कोला हो ,जे.के.सीमेंट या और कोई कम्पनियों के विज्ञापन को जरा गौर से देखिये तो पायेंगे क़ी ये विज्ञापन अपने उत्पाद का कम, लेकिन महिलाओं के उस मांसल सौन्दर्य,जिसे कुदरत ने बच्चों को भोजन देने के उद्देश्य से महिलाओं में निर्माण किया है या सेक्स क़ी किसी न किसी बातों के सहारे अपने उत्पाद को बेहतर दिखाने क़ी कोशिस कर रहा है /

अब जरा गौर करने  वाली बात है क़ी सीमेंट के विज्ञापन में  एक लड़की को स्विमिंग सुइट पहनाकर  उसके मांसल सौन्दर्य को TV पे प्रचारित करने के पीछे क्या मकसद हो सकता है ?
  
इसके जवाब में मुझे मेरे एक मित्र ने कहाँ कि ,इसका मतलब है कि ,भ्रष्ट इंजिनियरों और ठेकेदारों को यह ऐड दिखाकर,यह समझाया जा रहा है कि ,सरकारी कामों में अब गुणवत्ता कि जाँच कौन करता है,इसलिए सीमेंट कि गुणवत्ता को मत देखो / लेकिन इस भ्रष्ट खेल के पीछे तुम्हे इस तरह का शबाब और शराब के  गुणवत्ता कि पूरी गारंटी है / मैं यह जवाब सुनकर हैरान रह गया / मैंने जब उनसे इस सीमेंट को क्या आप खरीदोगे ? यह सवाल किया / तो उनका जवाब था ,इस विज्ञापन के बाद तो मैं इस सीमेंट को खरीदना तो दूर ,लोगों को भी नहीं खरीदने क़ी सलाह दूंगा / उनका ऐसा जवाब सुनकर मुझे यह महसूस हुआ क़ी अभी भी महिलाओं का इस तरह भद्दा प्रदर्शन करने वालों का विरोध करने वाले लोग मौजूद हैं /

कुछ लोगों ने तो इस ऐड कि कानूनी तौर पे शिकायत भी क़ी / मैंने भी कई TV चेनलों के प्रबंधकों को उनके व्यक्तिगत मोबाइल पर फोन कर इस ऐड को नहीं दिखाने का आग्रह किया /

अब सवाल उठता है क़ी क्या ऐसे ही विज्ञापनों से उत्पाद को बेचा जा सकता है ? जवाब है नहीं / क्योंकि उत्पाद को प्रचारित करने से सिर्फ उत्पाद नहीं बिकने लगता है / बल्कि उत्पाद क़ी गुणवत्ता और लोगों क़ी भावना दोनों ही बातों का ध्यान अगर विज्ञापन में प्रमुखता से दिखाया जाय तो ,ऐसे ऐड के प्रभाव से ज्यादा प्रभाव पड़ेगा / इस तरह के ऐड का कभी-कभी तो इतना नकारात्मक प्रभाव पड़ता है क़ी लोग अच्छे उत्पाद को भी खरीदना इस लिए बंद कर देते हैं क़ी,उसके विज्ञापन में सामाजिक परिवेश को खराब  करने वाले तत्व मौजूद होते हैं / 

ऐसे ऐड को बनाने वाले और कुछ लोभी TV चैनलों के कर्ता-धर्ताओं का तर्क है क़ी ,ऐसे ऐड को लोग ज्यादा देखते हैं,इसलिए हम बनाते और दिखाते हैं / ऐसे बीमार तथाकथित क्रिएटिव ऐड डायरेक्टरों को मेरा सन्देश यह है क़ी ,वे एक दिन नंगा होकर बाजार में चलें लोग उनको भी ज्यादा देखेंगे ?    

अब सवाल उठता है क़ी क्या ऐसे ऐड को रोका जा सकता है / जवाब है जब लोग ऐसे ऐड के खिलाप शिकायत करेंगे और ऐसे ऐड देने वाले कम्पनियों के उत्पाद को खरीदना बंद कर देंगे तो ऐसे ऐड दिखने भी बंद हो जायेंगे / 

अब सवाल उठता है क़ी ऐसे ऐड बनने के पीछे कारण क्या है तो इसका सीधा सम्बन्ध सेक्स,भ्रष्टाचार और भ्रष्ट सरकारी व्यवस्था से है / इस तरह के ऐड बनाने वाले निश्चय ही बीमार है और इस तरह के ऐड को बिना सामाजिक सरोकार क़ी समीक्षा किये प्रसारित करने वाले पैसों के भूखे हैं ,तथा इस तरह समाज के सेक्स भावना को गन्दा कर ,अपने उत्पाद बेचने वाले को अपने उत्पाद पर भरोसा नहीं है ,या वह सोचती है क़ी उसके उत्पाद को ऐसे  ही सोच वाले लोग खरीदेंगे या संभवतः उसे कोई गुमराह कर रहा है ?

निश्चय ही यह गम्भीर मुद्दा है जिस पर इस व्यवस्था से जुड़े जिम्मेवार लोगों और सरकार में महिलाओं के कल्याण के लिए बैठे लोगों को गंभीरता,ईमानदारी और अपनी सामाजिक जिम्मेवारी से सोचने क़ी जरूरत है / तबतक तो यही कहा जा सकता है क़ी ,ऐड वर्ल्ड बीमार ,मीडिया भूखा और कम्पनियों को अपने उत्पाद पे भरोसा  नहीं है /

Wednesday, April 28, 2010

हर मंत्री का नार्को, ब्रेनमेपिंग और लाई डिटेक्टर टेस्ट होना चाहिए-----?

                         
आज देश गद्दारों क़ी वजह से कराह रहा है / एक जमाना था क़ी आम जनता मंत्रियों,सांसदों,जनप्रतिनिधियों को हार्दिक सम्मान देते थे / लेकिन अगर आज किसी आम आदमी से इनके बारे में एक वाक्य बोलने को कहा जाय ,तो पता नहीं कितनी आक्रोश में क्या-क्या बोल जाय / जनता का गुस्सा जायज भी है / ये जनप्रतिनिधि और मंत्री एक मोटी तनख्वाह और भत्ता पाते तो हैं जनता के हितों और उनके दुखों के कारणों को दूर करने के लिए ,लेकिन वो करते क्या हैं,ये जग जाहिर है / देश के हालात इसकी पुष्टि भी कर रहे है /
     अब सवाल उठता है क़ी क्या हर जन प्रतिनिधि और मंत्री भ्रष्ट और गद्दार है ? जवाब है नहीं / लेकिन भ्रष्टाचारियों और गद्दारों क़ी वजह से अच्छे लोग भी बदनाम हैं,और गलत लोगों पर कोई नियंत्रण और समुचित कार्यवाही नहीं होने से भ्रष्टाचारियों और गद्दारों क़ी संख्या बढती जा रही है ,जो इस देश और समाज दोनों के लिए खतरनाक है /
कानूनी तौर पे देखा जाय तो किसी उच्च पद पे बैठा व्यक्ति और आम आदमी में कोई फर्क नहीं है ,और आज के हालात में अगर किसी आम आदमी का जमीर जिन्दा है ,तो वह देशहित के लिए उस मंत्री से ज्यादा उपयोगी है ,जिस मंत्री का जमीर मर गया है या किसी देश के गद्दारों के हाथ बिक गया है / 
ऐसे में मंत्रियों और देश क़ी कमान सँभालने वाले  उच्च अधिकारियों के जमीर क़ी गहन जाँच हर छह महीने में करना जरूरी बनाने से ही इस बात का पता लगाया जा सकता है, क़ी ये मंत्री है या अन्दर से किसी आतंकवादी से भी ज्यादा गद्दार /
                 इस बात को जरा ऐसे समझिये --मान लीजिये मैं  कृषि मंत्री हूँ ,और मेरे ऊपर लगातार आरोप लग रहें हैं क़ी मैंने अपने चमचों और रिश्तेदारों को फायदा पहुचाने के लिए 100 कड़ोर लोगों को महंगाई के मुहं में झोंक कर,उनके दो वक्त के रोटी को मुश्किल बनाकर ,उनका जीवन दुखदायी बनाने का काम किया है / 
                              अब मान लीजिये मैंने ऐसा नहीं किया है तो अगर देश हित में जनता और बिपक्ष क़ी संतुष्टि के लिए ,नार्को,ब्रेनमेपिंग और लाई डिटेक्टर टेस्ट  कराकर ,मैं अपनी बेगुनाही का सबूत दे देता हूँ ,तो मेरा कद चाहे राजनीतिक हो या सामाजिक दोनों ही रूप में ऊपर उठेगा /
अब सवाल है टेस्ट कैसे और किसके सामने हो क़ी उसकी विश्वसनीयता पर पूरा देश यकिन करे / 
टेस्ट अगर भारत के राष्ट्रपति,सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ,देश भर के सम्मानित इमानदार कम से कम 10 समाज सेवक और देश भर से चुने गए बेदाग 50 इमानदार व शिक्षित आम जनता  के सामने लाइव कराया जाय / जिसमे हर मंत्री और अधिकारियों पर लगे आरोपों से सम्बंधित प्रश्न किया जाय और उसके जवाब  पर मशीन और उपस्थित लोगों के मतों के अनुसार किसी को दोषी या बेगुनाह घोषित किया जाय / हमारे ख्याल से ऐसा करने से हमारे देश में पारदर्शिता क़ी एक मिसाल कायम होगी और उच्च पदों पर बैठे बड़े-बड़े गद्दार भी डरकर  गद्दारी करना छोड़ देंगे जिससे देश के  हालात में अचानक सुधार आना शुरू हो जायेगा /  
मैं एक नागरिक हूँ लेकिन अगर देशहित में मेरा नार्को,ब्रेनमेपिंग और लाई डिटेक्टर टेस्ट जरूरी है तो इस ब्लॉग पर मैं घोषणा कर रहा हूँ ,क़ी देश के किसी भी 10 इमानदार समाजसेवकों के सामने मैं टेस्ट देने को तैयार हूँ /
अगर मैं देश हित में ऐसा करने को तैयार हूँ ,तो मंत्री ऐसा क्यों नहीं करेंगे ? क्या मंत्री देशहित से बड़ा है  ?  आप सभी ब्लोगरों और भारत के राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री से मुझे जवाब क़ी आशा है /

Monday, April 26, 2010

अजित गुप्ता जी(अजित गुप्ता का कोना ब्लॉग) को बधाई / असीम त्रिवेदी जी ,तारकेश्वर गिरी जी ,अमित शर्मा जी और भावेश जी का धन्यवाद / समीर लाल जी,अजय कुमार झा जी,सुमन जी ,प्रवीन पांडे जी ,देव कुमार झा जी जैसे ब्लोगरों के विस्तृत टिप्पणी का इंतजार है -----

                                       My Photo          अजित गुप्ता जी(अजित गुप्ता का कोना ब्लॉग) को इस हफ्ते का,देश हित के मुद्दे पर 100 शब्दों में उम्दा विचार व्यक्त करें,में उम्दा विचार व्यक्त करने वाली ब्लोगर का सम्मान प्राप्त करने के लिए बधाई / अजित गुप्ता जी आप एक बार और इसी पोस्ट पर इसी मुद्दे पर किसी भी ब्लोगर के विचार को सराहने के लिए भी टिप्पणी करने क़ी केटेगरी में भी,अपनी टिप्पणी व्यक्त कर सकती हैं /  अंतिम तिथि है-13/06/2010 के रात 11.59 तक / आपसे अनुरोध है क़ी कृपा कर आप हमारे e.mail-honestyprojectdemocracy@gmail.com पर या इसी पोस्ट के टिप्पणी बॉक्स में अपना पूरा पत्राचार का वर्तमान पता और मोबाइल नंबर बताने का कष्ट करें / आप हमारे मोबाइल पर फोन करके भी हमें,अपना पता नोट करा सकते है -09810752301 पर / जिससे हम आपको सम्मान पत्र और इनाम का चेक भेज सकें / मोबाइल नंबर होने से हम आपसे बात कर आपके पते क़ी पुष्टि कर सकते हैं / विचार वयक्त करने के लिए हमारी ओर से बहुत-बहुत बधाई / आशा है आप आगे भी इसी तरह देश हित के मुद्दों के बारे में सोचकर अपनी बहुमूल्य राय अन्य ब्लोगरों के ब्लॉग पर भी रखती रहेंगी / ब्लोगरों क़ी सार्थक टिप्पणियां ही ब्लॉग क़ी ताकत है / इसके साथ ही हम असीम त्रिवेदी जी ,तारकेश्वर गिरी जी ,अमित शर्मा जी  और भावेश जी का विचार व्यक्त करने के लिए धन्यवाद करते हैं और समीर लाल जी,अजय कुमार झा जी,सुमन जी ,प्रवीन पांडे जी ,देव कुमार झा जी जैसे और भी ब्लोगरों के विस्तृत टिप्पणी का इंतजार कर रहें हैं ----- आप सबसे आग्रह है क़ी आप अपना बहुमूल्य विचार पोस्ट में उठाये गए मुद्दे के पक्ष,बिपक्ष या उस उद्देश से जुड़े अन्य बिकल्पों पर सार्थक विवेचना के रूप में अपना 100 शब्द जरूर लिखें / नीचे लिखे लिंक पर क्लिक करने से वह पोस्ट खुल जायेगा जिसके टिप्पणी बॉक्स में आपको टिप्पणी करनी है /
 अंत में एक बार फिर उन सभी ब्लोगरों का धन्यवाद और बांकी ब्लोगरों को विचार व्यक्त करने का आमन्त्रण /

Saturday, April 24, 2010

कॉमनवेल्थ गेम -----?

आज व्यवस्था पर व्यंग श्रृंखला में आप लोगों के सामने प्रस्तुत है "कॉमनवेल्थ गेम" विषय पर एक कविता -----

                     "कॉमनवेल्थ गेम"


कहने को ये कॉमनवेल्थ गेम है / 
असल में यह दिल्ली के कॉमन जनता के वेल्थ को छीनने  का खेल है /
इसके नाम पर भ्रष्टाचार कि कई नदियाँ बही /
सात सौ कड़ोर से सत्रह सौ कड़ोर ही सही /
छोटे भ्रष्टाचारियों का ये खेल नहीं /
बड़े-बड़े भ्रष्ट खिलारियों का सही गेम यही /
कई भ्रष्ट कुकर्मी हो गए मालामाल /
दिल्ली कि जनता का किया इसने बुरा हाल /
इसके नाम पे DTC में नयी बसें आई /
टिकटों  के नाम पे लूट ली गयी 
आम जनता की सारी कमाई /
छात्र,छात्राओं के बस-पास का बढाया इसने रेट भी /
माता-पिता के काटे इसने जेब और पेट भी /
बिना जरूरत के बने कई प्रोजेक्ट इस वास्ते /
जिससे जुड़ें है भ्रष्टाचार के गहरे रास्ते /
 यह सब देख जनता रो रही है /
अपने भ्रष्ट नेताओं को रो-रो कर कोस रही है /
अब तो जनता का एक ही सपना है /
भविष्य में लगे ऐसे गेमों पर पाबंदी और 
भ्रष्ट मंत्री और अधिकारी हो,तिहार जेल में बंदी /


ब्लोगर बंधुओं इस कविता पर अपनी प्रतिक्रिया देने के बाद नीचे दिए पोस्ट के लिंक पर भी जाने और देश हित में अपना विचार 100 शब्दों में जरूर व्यक्त करने क़ी कृपा करें / क्योंकि कल इस हफ्ते विचार व्यक्त करने का आखरी दिन है और सोमवार को इसी ब्लॉग पर उम्दा विचार व्यक्त करने वाले ब्लोगर के नाम और इनाम कि घोषणा क़ी जाएगी / अपने विचार नीचे लिखे पोस्ट के लिंक पर क्लिक करने के बाद खुलने वाले पोस्ट के टिप्पणी बॉक्स में ही करें / 


Friday, April 23, 2010

ब्लॉग--सत्ता--जनता------

आज व्यवस्था पर व्यंग श्रृंखला में "ब्लॉग--सत्ता--जनता"विषय पर एक कविता आप लोगों कि सेवा में प्रस्तुत है -------
                    

                     "ब्लॉग--सत्ता--जनता"





जनता हाहाकार कर रही है /
सत्ता हुंकार भर रही है /
ब्लॉग इस पड़ विचार कर रही है /
जनता महंगाई कि मार झेल रही है /
सत्ता महंगाई को विकाश कह रही है /
ब्लॉग और ब्लोगर कुछ करना चाह रही है /
भ्रष्टाचार के नंगे नाच को,अपने नजर से ब्लॉग पे उतार रही है /
IPL का  BPL से कड़ी भी जोड़ रही है / 
विपक्ष शोर मचा रही है /
चोर-चोर चिल्ला रही है /
विपक्ष कि भी मजबूरी है /
पेट भरना सब के लिए जरूरी है  /
जब से नितिन गडकरी आये /
बीजेपी और विपक्ष में थोरी बहुत मजबूती लाये /
मीडिया भी इस खेल में शामिल हो गई है /
मजबूरी में,सत्ता के समर्थन में,गाने गा रही है /
ब्लॉग और ब्लोगर यह सब जाँच रही है,
और ब्लॉग-जगत में एकजुटता चाह रही है /
जनता परेशान है /
सत्ता खुशहाल है /
ब्लॉग और ब्लोगर हाले-बयाँ कर रही है /
जनता उस दिन का इंतजार कर रही है /
ऐसे सत्ता कि कब्र खोदने कि घड़ी,नजदीक आ रही है /
ब्लॉग और ब्लोगर अपना काम कर रही है /
ऐसे सत्ता के कब्र के जगह का,देश में इंतजाम कर रही है /
इतना तो तय है ,एक दिन ऐसा आएगा /
जनता कि हाय,ऐसे सत्ता को खाकर मिटाएगा ?
चोर -उच्चके नगर भिखारी होंगे /
आम जनता और इमानदार सत्ता के प्रभारी होंगे /
ब्लॉग और ब्लोगर इसके उत्तराधिकारी होंगे /

Thursday, April 22, 2010

"दिल्ली मेरी जान" ------------?

 आज प्रस्तुत है व्यवस्था  पर व्यंग श्रृंखला में               " दिल्ली मेरी जान" विषय पर एक कविता आप लोगों की सेवा में --------

"दिल्ली मेरी जान" 

दिल्ली मेरी जान है /
शीला जी जैसी मुख्यमंत्री इसकी शान हैं /
दौरती है यहाँ लो-फ्लोर चमचमाती बसें /
जिसके भीतर है भ्रष्टाचार कि कई परतें घुंसी  /
यातायात को बर्बाद कर भ्रष्टाचार को आबाद किया /
लोगों कि जेबें काटकर मंत्रियों को आबाद किया /
इस दिल्ली में है फ्लाई-ओवर कि भरमार /
जिसके बोझ तलें दिल्ली कि जनता का जीवन बेकार /
झुग्गियों के पुनर्वास के नाम पर वर्षों से /
होता रहा भ्रष्टाचार का पुनर्वास कई-कई वर्षों से /
यहाँ कॉमनवेल्थ के मेले कि तैयारी है /
जिससे लोगों में अजीब सी खुमारी है /
यहाँ के ओद्योगिक क्षेत्र में सड़के हैं खस्ता हाल /
लेकिन मंत्रियों के क्या खूब हैं ,हाल-चाल /
न्यूनतम मजदूरी नहीं मिलता,यहाँ कामगारों को /
कई-कई गुना मिल जातें हैं,मंत्रियों और अधिकारियों को /
DDA के फ्लेटों कि भरमार है /
लेकिन उसे पाना और बसना दुशवार है /
मिलता नहीं यहाँ मुफ्त पानी कहीं पीने को /
कहने को है देश कि राजधानी जीने को /
शिक्षा मंत्रालय में जब अरविंदर सिंह लवली आयें /
स्कूल प्रबंधकों के लिए खुशखबरी लायें /
जब से अरविंदर सिंह लवली यातायात मंत्रालय में आयें /
बस से यातायात करने वाले हैं घबराये-घबराये /
पूरे देश के रखवाले यहाँ रहतें हैं /
लेकिन देश कि रखवाली कहाँ करतें हैं /
कहने को "दिल्ली" देश कि जान और शान है /
लेकिन आम लोगों के लिए तो परेशान,बेहाल-फटे-हाल है /
कॉमनवेल्थ गेम में देश और विदेश से आयेंगे लोग कई /
देखेंगे इस दिल्ली का असल आत्मा और मुखौटा नयी /
यमुना यहाँ बहती है /
इस दिल्ली के गंदगी और भ्रष्टाचार कि कहानी कहती है /