क्या आप समझते हैं कि जनता को सरकार को संयुक्त हस्ताक्षर अभियान के जरिए,आदेश देने का अधिकार है?

Monday, August 9, 2010

इस देश में गरीबी ,बेरोजगारी और भूखमरी बढ़ने के असल कारण जानिए ......

इसकी कहानी में कई छेद है तो देश की अर्थव्यवस्था का क्या कहना ..?
अभी तक मैं इस तलाश में भटक रहा था क़ी सभी साधनों और संसाधनों के बाबजूद हमारे देश और समाज क़ी इतनी बुरी हालात क्यों है ? अब जाकर लखनऊ के राकेश कुमार सिंह और मुंबई के अनिल खत्री (RTI कार्यकर्त्ता) के अथक प्रयास और देश भक्ति से भरे सोच क़ी वजह से इसका मुझे पता चल सका है |

आप भी इस लिंक पर जाकर पढ़िए    

http://www.saveindianrupeesymbol.org/2010/06/violation-guidelines-indian-rupee.html


अब पढने के बाद आप भी सहज अनुमान लगा सकते है क़ी जिस देश का वित्त मंत्रालय रूपये के प्रतीक चिन्ह  क़ी  तलाश में भी सारे नियम-कायदों क़ी अनदेखी कर थोड़ी सी भी ईमानदारी और पारदर्शिता को नहीं अपना सकता है तो उस  वित्त मंत्रालय से  देश क़ी  अर्थ  व्यवस्था को  ईमानदारी  से  चलाने क़ी आशा कैसे क़ी जा सकती है ? 
इस छोटी सी प्रतियोगिता में इतने छेद हैं तो पता नहीं जहाँ अडबों का खेल होता होगा वहाँ कितने छेद होते होंगे और उस छेद से जनता के टेक्स के पैसे को बहा दिया जाता होगा  ? 


सवाल वही --निगरानी और सुधार करे कौन तथा दोषियों को सजा दे कौन ? 


शायद ये देश अभी और दुर्दशा झेलने को मजबूर है ...फ़िलहाल तो  वित्त  मंत्रालय की कार्यप्रणाली  को संदेहास्पद ही  कहा जा सकता है ..? जिसकी जाँच गंभीरता से करने की जरूरत है |



यहाँ यह भी बताना जरूरी है की राकेश सिंह जी ने देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को सैकरों पन्नों के सबूतों के साथ अपनी शिकायत भेजी है | लेकिन 40 दिनों बाद भी इस देशभक्त और इमानदार नागरिक को कोई जवाब नहीं मिला है | दुःख इस बात का सबसे ज्यादा है की देश का  राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री भी देश की व्यवस्था को सुधारने   के प्रति गंभीर नहीं हैं ,ऐसे में एक इमानदार नागरिक के पास उपाय क्या  है ..अथक देशभक्ति भरे प्रयासों के बाद मिलती है बेबसी और लाचारी ...?

8 comments:

  1. @आदरणीय झा जी

    मुझे लगता है की इस विषय पर तथा और भी अनेकों विषय पर स्वामी रामदेव जी और उनका भारत स्वाभिमान संगठन को एक आशा की किरण के रूप में देखा जा सकता है ,आपको भी उससे जुडना चाहिए

    आपका,हमारा और उनका लक्ष्य एक ही है

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  2. झा जी पहले तो हम सब को कल कि पोस्ट के बारे लिखे कि आप के विचार हम सब के कहने से बदले या नही, अगए बदले तो हम सब को बहुत खूशी होगी, आज सारा दिन आप के बारे सोचते सोचते निकला, इन लोगो से आप अकेले ही नही सभी परेशान है, कोन ईमान दार है इन नेताओ मै जो देश के बारे सोचता हो? फ़िर इन्हे पत्र लिख कर देने से कोई लाभ नही, अच्छा हो जनता को जाग्रुक करे, उन्हे बतलाये कि जनता मै बहुत दम है, यही जनता इन लोगो को ताज पहनाती है, तो इन का सर भी अपने पांवो से कुचल सकती है, अगर हम बारि बारी हिम्मत हार कर खुद को मारते रहे तो... इन्हे कोन आम्के दिखायेगां, अगर अग्रेजो से हार मान कर हमारे शहीद आत्म ह्त्या करना शुरु कर देते तो देश कब आजाद होता??? भारत मै दुनिया की सभी चीजे मिलती है, आज भी यह सोने की चिडिया है, लेकिन आज गिद्धो का राज हो गया है जो इस सोने की चिडिया को नोंच नोंच कर का रहे है, ओर हम सब को इन गिद्धो को आसमान से ऊतार कर इन्हे इन की ओकात दिखानी है, ओर यह अकेले के बस का नही... सभी जाग्रुक हो.... ओर दिखी जनता जरुर जागेगी, आप हिम्मत ना हारे, ओर डटे रहे, ओर गलत ना सोच... बल्कि लोगो को साथ मिलाये उन्हे जागरुक करे

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  3. लेकिन 40 दिनों बाद भी इस देशभक्त और इमानदार नागरिक को कोई जवाब नहीं मिला है | ओर मिलेगा भी नही, क्योकि इन्हे जिन्होने ने चुना है यह तो उन की बात सुने गे.

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  4. @ राज भाटिया साहब
    सबसे पहले धन्यवाद आपका की आपने मेरे बारे में सोचा ,मैं कोशिस कर रहा हूँ लेकिन मैं सिर्फ अपने दुःख से दुखी नहीं हूँ बल्कि इस देश में जितने भी जिन्दा जमीर वाले लोग हैं सबको इसी हालात से गुजरना पर रहा है उनके सत्य और ईमानदारी से भरे अथक परिश्रम का कोई भी परिणाम नहीं मिलता है ,जबकि वह अपना पूरा समय,पैसा अपना सुख चैन सब उसमे लगाता है | ऐसे हालात में कोई भी क्या करेगा ..? हर रोज मेरी कई RTI कार्यकर्ताओं तथा कई इमानदार समाज सेवकों से बात होती है और उनके दुःख को सुनकर दुखी हो जाता हूँ ,अपने आप को असहाय पाता हूँ ...मैं जानता हूँ की RTI से सूचना पाना कितना दुष्कर कार्य है ,उसके बाद भी कमियों को दिखाने के बाद भी कार्यवाही का ना होना बेशर्मी की हद है ...

    बहुत दर्दनाक अवस्था है ,आजादी से पहले इस देश को हैवानों की गुलामी करनी पर रही थी अब बेशर्म हैवानों की गुलामी करनी पर रही है बस इतना सा बदलाव आया है आजादी के बाद ...पता नहीं क्या होगा ...

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  5. अगर अग्रेजो से हार मान कर हमारे शहीद आत्म ह्त्या करना शुरु कर देते तो देश कब आजाद होता???

    राज भाटिया जी ने क्या बात कह दी , झा जी कृपया करके इस पर विचार करें

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  6. जय जी हिम्मत हारने से कुछ नहीं होता...राज जी की बात सोचिए....अगर हर हिंदुस्तानी आत्महत्या जैसा कायराना कदम उठाएगा तो देश कौन बचाएगा..सत्य औऱ असत्य के बीच तो जंग हमेशा से ही चलती रही है..इसमें लड़ने की जरुरत है या इससे भाग जाने की.....गीता जिस देश में रची गई उस देश के लोगो को पलायन क्या शोभा देता है....आप ने इतना देखा है..जाना है..देश में कई स्तर पर जाने कितने लोग अपनी सुख सुविधा का ख्याल छोड़ समाज के हित में लगे हुए हैं....क्या वो भाग गए? नहीं न....फिर आप क्यों सोच रहे हैं ऐसा.....ईमानदार आदमी मजबूर कैसे होता है....ये तो आज देश के प्रधानमंत्री भी जानते हैं....उनसे बेहतर कौन समझेगा...पर जरा बताइए अगर वो छोड़ देते हैं ये पद .... तो क्या ईमानदारी का पलायन नहीं होगा..क्या वर्तमान परिदुश्य में प्रधानमंत्री इन लोगो के खिलाफ कदम उठा कर सरकार बचा पाएंगे....ये कलियुग है औऱ असत्य के खिलाफ जंग मे कभी कभी लोहे को लोहा ही काटता है का सिद्धांत काम करता है....जब त्रेतायुग में भगवान ने बाली वध के लिए छुप कर वार किया तो आज तो घोर कलियुग है...जान देने की बात करके देश के लिए चल रहे समर से पलायन करने की बात तो बड़ी ही कायराना हरकत है.....अगर कोई अपने जीवन से दुखी होकर ऐसा कदम उठाए तो उसकी हताशा समझी जाती है....पर देश के लिए काम करने वाले निस्वार्थ लोग हताश हो जाएं ये अच्छी बात नहीं....देश के लिए कार्य करके उऋण होने का जो सुअवसर मिल रहा है उसका उपयोग करते हुए तो आपको तो अथाह उर्जा से भरा होना चाहिए..पर आप ये क्या कायरों सा कदम उठाने की बात कर रहे हैं....घर के कामों में तो मैं बहुत ही परेशान होता हूं.....पर बाकी किसी काम में नहीं...मैं लगा रहता हूं .कि मेरे प्रयासों से कहीं न कहीं कुछ न कुछ होता है चाहे अंश भर ही सही....

    आप जानते हैं क्या कि राजेंद्र प्रसाद ने साफ मना कर दिया था कि वो राष्ट्पति का पद नहीं संभालना चाहते..पर गांधी जी ने कहा कि कोई तो होना चाहिए जो विष पिए....बस उसके बाद राजेंद्र बाबू एक बार नहीं दो बार लगातार देश के राष्ट्रपति बने वो भी रिकॉर्ड तोड़ मत से....नेहरु के बिल्कुल न चाहने के बावजूद...वो दूबारा लड़े...समझ रहे हैं न आप.... तो निराशा छोड़िए.....देश हमारे से पहले भी था औऱ आने वाले युगों युगों तक बना रहेगा....हर युग में सिर्फ भारतवर्ष ही रहेगा....और कोई नहीं...ये अमिट सत्य है..इसे जानिए..बस ये मानिए कि हम अपना काम करते रहेना चाहिए....देश की वर्तमान हालात से उपजी परेशानी को खत्म करना चाहते हैं तो आनंदमठ एक बार जरुर पढ़िए.....औऱ विवेकानंद की आत्मकथा भी ....फिर आप इस नैराश्य के वातावरण से आसानी से निकल जाएंगे

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  7. @boletobindas KE BAT SE MAI SAHMAT HO. जय जी AAPKO PUNERVICHAR KARNA CHAHIYE.

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